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फिल्म रिव्यु: कश्मीरी पंडितों के दर्द को जीवंत करती विधु चोपड़ा की फ़िल्म शिकारा

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शिकारा

बॉलीवुड की  बहुप्रतिक्षित फ़िल्म शिकारा आज शुक्रवार 7 फरवरी को सिनेमाघरों में रिलीज हो गई है। विधु चोपड़ा की इस  फ़िल्म ने कश्मीर के हालातों और कश्मीरी पंडितों के दर्द को हूबहू जनता तक पहुँचाया है। कश्मीर का मुद्दा क्या था, यह आज सभी जानते हैं। आतंकी हमला से थर थर कांपता कश्मीर , वहां रहने वाले कश्मीरी पंडितों का दर्द, नरसंहार, जो आज अपने ही देश में रिफ्यूजी की तरह रह रहे हैं जैसी सच्चाई  को विधु चोपड़ा ने अपनी फिल्म में एक प्रेम कहानी के माध्यम से जीवंत किया है। इस फिल्म की कहानी में डाले गए इमोशंस को देख कर आप ऐसे दर्द का हिस्सा बन जायेंगे जो हमने सिर्फ अखबारों में पढ़ा है या न्यूज़ चैनल्स से देखा है|

शिकारा

फिल्म की कहानी

फ़िल्म की कहानी दो कश्मीरी पंडितों शिव कुमार धर और उसकी पत्नी शांति धर की है, जो कश्मीर में सुख और शांति से अपना जीवन बिता रहे थे, ऐसे में धीरे धीरे कश्मीर घाटी में सांप्रदायिक तनाव चारों ओर फैलना शुरू हो गया और उनके जैसे ना जाने कितने ही कश्मीरी पंडितों को अपना घर अपना सबकुछ छोड़ कर अपनी जान बचाने के लिए भागना पड़ा। यह कहानी 1990 की है जब धरती के स्वर्ग कश्मीर में आतंकवाद की जड़े इतनी मजबूत हो चुकी थी , कि लाखों कश्मीरी पंडितों को जान बचाकर भागना पड़ा , इनमे शिव और शांति भी थे, जो अपना आशियाना छोड़कर रिफ्यूजी कैम्प में रह रहे थे। उनके हर दर्द को मार्मिक तरीके से विधु चोपड़ा ने दर्शाया है । इस फिल्म में किसी भी प्रकार का बनावटीपन नहीं है| पूरी कहानी अपनी बात सरलता से कहती है|

अभिनय

यदि अभिनय क्षमता की बात की जाए तो एक्टर आदिल खान (शिव) और सादिया (शांति) ने अपना बॉलीवुड डेब्यू किया है और खुद को इस रोल में पूरी तरह से डूबा दिया है। उन दोनों का  अभिनय किसी मझे हुए अभिनेता और अभिनेत्री जैसा है| कही से नही लगता है कि यह उन दोनों की पहली फिल्म है| इसमे शिव कुमार एक टीचर बने हुए है जो कि श्रीनगर के एक स्कूल में पढ़ाते हैं। कश्मीर में होती घटनाओं से सहम जाना, घबराना, उनका दर्द सभी भावनाओं को उन्होंने बखूबी निभाया है। शान्ति ने भी शिव के प्रति अपना प्यार, रिफ्यूजी कैम्प में रहने का दर्द, डर कर भी उम्मीद ना छोड़ना सभी भावनाओं को बहुत खूबसूरती से निभाया है। आप फ़िल्म देखते देखते इस प्यारी सी जोड़ी से जुड़ाव महसूस करेंगे। उनके हर दर्द को आप खुद महसूस कर पाएंगे।

डायरेक्शन

इस फ़िल्म के डायरेक्टर विधु चोपड़ा ने हमें कश्मीर का वह दृश्य दिखाया जो हमने सिर्फ अखबारों में पढ़ा था। हमनें वह वहाँ के हर दिल दहला देने वाले वारदातों को महसूस करवाया है। रातोंरात कश्मीरी पंडितों के घरों का जल जाना, अपना घर सबकुछ छोड़ जाने के लिए धमकी मिलना, अपनों की जान गवाना, चारों ओर गोलियों की बारिश होना सभी को इतना जीवंत रूप दिया गया है कि आप के आंखों में आंसू आ जाएंगे, आप उस भयावह दृश्य को अपने सामने महसूस कर पाएंगे।

संगीत

ए आर रहमान और कुतुब-ए-कृपा का बैकग्राउंड संगीत काफी खूबसूरत है। ऐ वादी शहजादी गाने का चित्रण बहुत ही मार्मिक है शायद ही आप इसे सुन कर अपने आँसुओ को रोक पाएं। इस फ़िल्म की सिनेमेटोग्राफी भी काफी बढ़िया है जो कि रंगराजन रामभद्रन ने की है। जिन्होंने कश्मीर की वादियों से लेकर , रिफ्यूजी कैंप का बहुत सुन्दर चित्रण किया है|

क्यों देखें

यह एक पावरफुल कहानी पर बनी फिल्म है| इस फिल्म को देखने के बाद आपको कश्मीरी पंडितों का दर्द और शिव और शांति की प्यार की कहानी  अंदर तक महसूस होगी। 30 सालों से जो कश्मीरी पंडित अपने दर्द को अपने सीने में दबा कर बैठे है उससे हमें इस फिल्म ने  रूबरू करवाया है, उसे महसूस करवाया है। इसलिए यह फ़िल्म जरूर देखना चाहिए। यह फिल्म से कही ना कही मुश्किलों से हार ना मानना और छोटी छोटी खुशियों का जश्न  मनाने की भी सीख आपको मिलेगी| यह फ़िल्म 5 में से 4  स्टार अपने नाम करती है।

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