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क्या महाराष्ट्र में बिना BJP के सरकार बनाना शिवसेना का आखिरी सुसाइड है ?

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क्या महाराष्ट्र में बिना BJP के सरकार बनाना शिवसेना का आखिरी सुसाइड है ?

तो क्या मुख्यमंत्री पद के लालच में ‘बर्बाद’ हो गई शिवसेना ?

जी हां ये सवाल इसलिए भी क्येंकि महाराष्ट्र में बीजेपी के इनकार करने के बाद, प्रदेश में नई सरकार के गठन को एक बार फिर से हलचल तेज हो गई…बीजेपी के मना करने के बाद, शिवसेना से जैसे ही राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी ने पूछा, वो कवायद में जुट गई। समर्थन के लिए वो एनसीपी और कांग्रेस के दरवाजे पर दस्तक दे रही है। सत्ता के लिए शिवसेना, एनसीपी की कुछ भी करने को तैयार दिखाई दे रही है। लेकिन साथ ही शिवसेना के इस फैसले पर सवाल भी उठ रहे हैं।

दरअसल बीजेपी का साथ छोड़कर विरोधियों संग सरकार बनाने की शिवसेना की कोशिशों की काफी आलोचना हो रही है। लोगों का मानना है ये फैसला आने वाले दिनों मे शिवसेना को भारी पड़ने वाला है। ऐसा इसलिए, क्योंकि प्रदेश की जनता ने अकेले शिवसेना को वोट नहीं दिया था। लोगों ने बीजेपी-शिवसेना गठबंधन को सरकार बनाने का जनादेश दिया था। ऐसे में संदेश यही जाएगा कि शिवसेना ने अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए जनादेश का अपना किया है।

कहा तो यहा तक जा रहा है कि अगर शिवसेना, बीजेपी का साथ छोड़कर विपक्षी दलों के साथ जाती है, तो फिर उसे अगले चुनाव में इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी। बीजेपी-शिवसेना की दोस्ती दशकों पुरानी थी। दोनों की विचाराधारा करीब-करीब एक रही है। इसका बड़ा उदाहरण अतीत में देखने को मिल चुका है। 2014 के चुनाव में दोनों ही दलों ने अलग-अलग चुनाव लड़ा था, जिसकी कीमत शिवसेना को चुकानी पड़ी थी। प्रदेश की कुल 288 सीटों पर अकेले चुनाव लड़ने के बावजूद शिवसेना को महज 63 सीटें ही मिली थी। जबकि बीजेपी अपने दम पर 123 सीटें जीतने में कामयाब हुई थी।

अगर इस बार के चुनाव की बात करें, तो दोनों साथ मिलकर चुनाव मैदान में उतरी थी, बीजेपी जहां 105 सीटें जीतने में कामयाब हुई, तो वहीं शिवसेना महज 56 सीटें ही जीत पाई। जानकारों की मानें तो, अगर शिवसेना अकेले चुनाव लड़ती तो शायद इससे भी कम सीटें मिलती। यानी साफ है कि बीजेपी के साथ गठबंधन की वजह से भी शिवसेना को इतनी सीटें जीतने में मदद मिली है। लेकिन अगर गठबंधन टूटा, और चुनाव हुए, तो शिवसेना को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ी।

प्रदेश की सियासत पर खासकर शिवसेना को करीब से जानने वालों की मानें, तो बीजेपी का साथ छोड़ने का कदम सुसाइडल स्टेप से कम नहीं है, क्योंकि इससे लोगों के बीच संदेश यही जाएगा कि शिवसेना को विचारधारा से कोई मतलब नहीं है, और उसके लिए सत्ता ही अहम है। यानी साफ है कि मुख्यमंत्री पद की लालच में शिवसेना खुद को बर्बाद कर रही है।

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