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आर्थिक मंदी की चपेट में भारतीय बाजार, मोदी सरकार को अब ढूढ़ना होगा इसका समाधान

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मौजूदा दौर की भारतीय सरकार के सामने जो एक सबसे बड़ा सवाल खड़ा हुआ है, वो है आर्थिक मंदी, क्या भारतीय बाजार आर्थिक मंदी की चपेट में आ गया है? इसी सवाल का जवाब    इस समय सभी अर्थशास्त्री भारतीय सरकार से पूछते हुए नजर आ रहे हैं. अगर हाल ही के बिजनेस रिपोर्ट्स को पढ़ा जाए तो ये बात साबित होती है कि भारतीय अर्थव्यवस्था में मंदी का साया तो है, साथ ही भारतीय कंपनियां इस मंदी से निपटने के लिए कई तरह के उपाय इस्तेमाल में लाने लगी हैं.

अगर इस मामले में हम रिपोर्ट्स को अलग भी रखते हैं तो भी कई विशेषज्ञ ही इस मंदी के संकेत दे चुके हैं, सबसे पहले बजट के बाद प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के एक सदस्य ने बजट के आंकड़ों पर ही सवाल खड़ा कर दिया था. फिर हाल ही में नीति आयोग के उपाध्यक्ष राजीव कुमार ने स्पष्ट कहा कि भारतीय वित्तीय व्यवस्था अपने 70 साल के सबसे बुरे दौर से गुजर रही है. भारतीय रिजर्व बैंक के गर्वनर शक्तिकांत दास ने भी दिल्ली में देश की मौजूदा दौर की अर्थव्यवस्था पर अपना पक्ष रखते हुए कहा था कि वर्तमान में वैश्विक अर्थव्यवस्था लगातार तनावपूर्ण व्यापारिक वार्ता के वातावरण में अनिश्चितता की ओर जा रही है. यही कारण है कि कुछ मसलों का समाधान निकालना कठिन होता जा रहा है.

इन सवालों के साथ अब इस बीमारी के हल की जरुरत है क्योंकि अर्थव्यवस्था किसी शरीर में ह्रदय की तरह होती है, अगर सही समय में ध्यान ना दिया जाए तो ये देश की नीतियों के साथ- साथ सभी व्यवस्थाओं को खोखला कर देगी.

एक नजर इन आंकड़ों पर-

अब अगर अप्रैल-जून तिमाही की बात करें तो भारत की जीडीपी में गिरावट देखने को मिली है पूर्व की 5.8 फीसदी से घटकर 5 फीसदी पर आ गई है. कृषि प्रधान देश में कृषि विकास दर में ऐतिहासिक गिरावट देखने को मिली है. गिरावट के साथ ये 2 फीसदी पर पहुंच गई है, पहले ये 5 फीसदी से अधिक थी. मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर में ऐसा दोयम दर्जा देखने को मिल रहा है कि ये  महज 0.6 फीसदी की दर से बढ़ रहा है जो वर्ष 2018 की इसी तिमाही में 12.1 फीसदी की दर से बढ़ रहा था. इसका नतीजा ये हुआ है कि ऑटोमोबाइल सेक्टर में नई नौकरियां बनने की बात तो दूर बल्कि बड़े स्तर पर नौकरियां जा रहीं हैं.

डिमांड और सप्लाई के इस दौर में-

डिमांड और सप्लाई के इस दौर में पूरा बाजार मांग की कमी से जूझ रहा है, हर क्षेत्र में नकारात्मक प्रभाव देखने को मिल रहे हैं, सरकार नें बैंको के विलय की घोषणा भी की है, इन सभी पहलुओं पर नजर डालिए तो पता चलता है कि भारत आर्थिक मंदी के दुष्प्रभाव में फंस चुका है.

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निकलने के रास्ते में ही मिल सकता है समाधान-

किसी भी देश में जब मंदी का प्रभाव आता है तो उससे निकलने के लिए निजी क्षेत्र से पहले सरकार पहल करती है, भारतीय सरकार नें भी अपने पत्ते खोले तो जरूर हैं कि इस मंदी से बाहर आया जा सके, सरकार को अब कुछ ऐसे फैसले लेने होंगे जो लोगों को चकित कर सकें सिवाय नोटबंदी के, राजकोषीय घाटा को ध्यान में रखते हुए खर्च सीमा बढ़ानी होगी. इसके साथ ही आपको अवगत करा दें कि साल 2007-08 में जब वैश्विक मंदी आई थी, तब राजकोषीय घाटा 12 फीसदी तक बढ़ गया था.

सरकार को रोजगार के मौके बढ़ाने में जोर देना होगा, क्योंकि सरकारें जब रोजगार सृजन का काम नहीं करतीं तब आने वाले भविष्य के लिए असुरक्षा का माहौल बना देती हैं.

अब मेक इन इंडिया की जगह मेक इन लुधियाना, पुणे, कानपुर, बेंगलूरू, सूरत, चंडीगढ़ की जरूरत है. इन्हीं के दम पर मंदी रोकी जा सकती है. याद रहे कि भारत का कीमती एक दशक पहले ही बर्बाद हो चुका है.

 

(Source-Research Based Journalism)