18 June 2021

jansatta special story on current affairs on reach of healthcare in seven lakh villages of country – सात लाख गांवों तक आखिर कैसे पहुंचे स्वास्थ्य सेवा!

मनोज कुमार मिश्र
देश भ्रमण के शौकीन एक सज्जन कोरोना काल में बिहार के सीतामढ़ी के पास के अपने गांव पहुंचे तो उन्हें बुखार आया। उन्होंने अपने गांव के आरएमपी डॉक्टर जिन्हें आम जन और आइएमए जैसी संस्था ‘झोला छाप डॉक्टर’ कह कर उपहास उड़ाती है, से बुखार की दवा ली और कुछ दिन में ठीक हो गए। उनके एक परिचित ने उन्हें किसी अच्छे डॉक्टर से दिखाने की सलाह दी तो उन्होंने मीडिया में छाए रहने वाले एक बड़े डॉक्टर का नाम लेकर कहा कि क्या वे बुखार की कोई और दवा दे देंगे? अगर कोरोना होगा, तब भी वे क्या कर लेंगे, उनके पास कोरोना की दवा है क्या? उस सज्जन का यह जवाब सही नहीं माना जा सकता और इस तरह से किसी से दवा लेकर उपचार कराना खतरनाक हो सकता है। बावजूद इसके कोरोना ने देश भर में जो हालात बना दिए हैं उससे ऐसे अनेक सवालों के जवाब मिलने संभव नहीं हैं।

लेकिन इस महामारी ने अपने देश की जर्जर स्वास्थ्य व्यवस्था पर से पर्दा हटाकर पूरी शासन प्रणाली को बेनकाब कर दिया है। अप्रैल में जब पाड़ितों की संख्या बेहिसाब बढ़ गई थी, तब देश की राजधानी दिल्ली समेत सभी बड़े शहरों में भी कोरोना मरीजों के उपचार के इंतजाम नाकाफी हो गए थे। भारी अफरातफरी मची थी। अस्पतालों में भर्ती होने से लेकर ऑक्सीजन और दवा उपलब्ध कराना कठिन हो गया था। यह संकट ज्यादा बड़ा इसलिए हो गया है कि कोरोना देश के गांवों में पहुंचकर आतंक मचा रहा है। बड़े शहरों समेत हर शहरों में अस्पतालों में बिस्तर बढ़ाने के नाम पर कहीं भी, बिना बुनियादी सुविधाओं के कोरोना अस्पताल बना दिए गए हैं। जहां डॉक्टर की कौन कहे मरीजों के उपचार की बुनियादी सुविधाएं भी नहीं हैं।

जब यह हाल बड़े शहरों का है तो गांवों और छोटे शहर, जहां पहले से ही पूरी स्वास्थ्य प्रणाली खुद ही जीवनरक्षक प्रणालियों (वेंटिलेटरों) पर है उनसे इस महामारी में उपचार के लिए अपेक्षा करना गलत होगा। बड़े पद पर तैनात रहे एक अधिकारी बताते हैं कि आजादी से अब तक किसी भी सरकार ने न तो पूरे देश की 134 करोड़ आबादी के लिए स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध करवाने की सही योजना बनाई न ही यह आसानी से संभव है। देश में करीब सात साख गांव हैं। ज्यादातर गांवों में या तो प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र है ही नहीं या है तो उसके लिए बुनियादी सुविधाएं ही नहीं हैं। एक तो देश में डॉक्टरों की वैसे ही कमी है, ऊपर से एक बड़ी तादात उन डॉक्टरों की है जो सरकारी नौकरी करने के बजाए निजी प्रेक्टिस करने को ज्यादा प्राथमिकता देते हैं। फिर ऐसे डॉक्टरों की भी बड़ी तादात है जिनकी गांव के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर नियुक्ति होने पर भी शहरों में ही रहते हैं।

बिहार, उत्तर प्रदेश ही नहीं ज्यादातर राज्यों में इन स्वास्थ्य केंद्रों की कौन कहे रेफरल और सरकारी मेडिकल कालेजों से जुड़े अस्पतालों का वही हाल है। इन अस्पतालों में उपचार होना तो दूर बुनियादी जरूरतों की चीजें भी उपलब्ध नहीं है। बहुत जगह तो भवन ही नहीं है। भवन है तो इस हाल में है कि वह कचरा घर बन चुके हैं। जिन राज्य सरकारों ने अपने सरकारी डॉक्टरों की गांव में तैनाती पर कड़ाई से अमल करवाई, वहां तो टेबुल-कुर्सी आदि दिख भी जाते हैं अन्यथा ज्यादातर में तो स्वास्थ्य केंद्र कागजों पर ही चलता है।

सरकारी डॉक्टरों की निजी अस्पतालों से सांठगांठ और सरकारी डॉक्टरों की निजी अस्पतालों में काम करने की इतनी बड़ी तादात है कि उस पर चर्चा ही बमानी लगता है। निजी अस्पताल दिल्ली, मुंबई से लेकर छोटे कस्बे तक फैले हुए हैं। उसमें उपचार करवाने की हैसियत गिनती के लोगों की है। दूसरा, वे हर गांव, कस्बे में नहीं हैं और न ही इस तादात में हैं कि सभी का उपचार आसानी से कर पाएं।

देश की बड़ी आबादी आज भी इन आरएमपी या झोला छाप कहे जाने वाले डाक्टरों से मामूली पैसे में उपचार करवाती है। नीम-हकीम खतरे जान का मामला है, इससे बचना जरूरी है लेकिन भले ही सरकार इन आरएमपी डाक्टरों को मरीज देखने की विधिवत अनुमति न दे लेकिन एक प्रशिक्षण देकर और कोई प्राथमिक परीक्षा लेकर शुरुआती उपचार की इजाजत दे सकती है। उनसे यह लिखित में हलफनामा ले लिया जाए कि वे प्राथमिक उपचार के बाद जिले के या राज्य मुख्यालय के अस्पताल में उपचार के लिए रेफर कर दे।

यह व्यवस्था कोरोना महामारी के इस संकट के समय उसी तरह से हो जिस तरह से शिक्षा मित्रों के बूते बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों के गांवों के सरकारी स्कूल चल रहे हैं। कई स्कूल तो ऐसे हैं जिनमें केवल शिक्षा मित्र ही बचे हैं। इसमें वेतन आदि का मुद्दा उठता है। इसके लिए भी हलफनामा आदि का इंतजाम हो लेकिन इससे गांवों के स्वास्थ्य केंद्र आबाद हो जाएंगे और लोगों का शुरुआती उपचार आसान हो जाएगा। इसके लिए राज्य सरकारों के साथ मिलकर केंद्र सरकार को ठोस और दीर्घकालीन योजनाएं बनानी ही होंगी। बड़ी तादात में मेडिकल कालेज खोलने होंगे और स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़े कर्मचारियों की भर्ती करनी होगी।



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