18 June 2021

jansatta religion story spiritual informations on Panchsheel sermon, Buddhist philosophy is contemplative – पंचशील उपदेश: चिंतनमूलक है बौद्ध दर्शन

शास्त्री कोसलेन्द्रदास
पिछले ढाई सहस्त्राब्दियों से जिस दर्शन की गूंज भारत और आसपास के देशों में व्यापक रूप से छा गई वह गौतम बुद्ध का चलाया बौद्ध दर्शन है। शुरू में यह एक दार्शनिक प्रस्थान मात्र था, जो धीरे-धीरे धर्म के रूप में परिवर्तित हो गया और अब अनेक लोग बौद्ध धर्म के अनुयायी हैं।

बौद्ध दर्शन चिंतन-मूलक है अर्थात जो बुद्ध के चिंतन में आया, वही बौद्ध दर्शन का आधार है। बौद्ध धर्म एवं बौद्ध दर्शन के उपदेश में उपदेष्टा बुद्ध की करुणा ही कारण है। उनके अनुसार सत्य के दो प्रकार हैं-पारमार्थिक एवं सांवृतिक। पारमार्थिक सत्य ही शून्य है और सांवृतिक है संसार का सत्य। जितने भी सांवृतिक सत्य हैं, वे क्षणभंगुर हैं। पारमार्थिक सत्य के साक्षात्कार से ही जन्म-मरण के चक्र से छुटकारा मिल सकता है।

बुद्ध के देशनाओं (उपदेश) के अनुसार पंचशील के अनुष्ठान एवं दार्शनिक ज्ञान के अभ्यास से निर्वाण प्राप्त होता है। गौतम बुद्ध ने अपने अनुयायियों को पंचशील की कठोरता से पालन की प्रेरणा दी है। उनके मत से पंचशील के पालन से व्यक्ति की आत्मिक उन्नति होती है और वह ज्ञान पाने के योग्य होता है। ये पंचशील हैं-हिंसा न करना, चोरी न करना, व्यभिचार न करना, झूठ न बोलना एवं नशा न करना।

गौतम भी कहे जाते हैं धर्मराज
प्राय: लोग धर्मराज के नाम से महाभारत के पांडुपुत्र युधिष्ठिर को जानते हैं। यह अल्पज्ञात है कि गौतम बुद्ध ने स्वयं को ‘धर्मराज’ कहा है और धर्म-चक्र चलाने वाला माना है। ईसा की कई शताब्दियों पूर्व गौतम बुद्ध ने अपने पहले के लोगों का मत प्रकाशित कर दिया था कि नरक कोई एक स्थान नहीं है, प्रत्युत वह है किसी वर्ण के लिए निर्धारित कर्मों के करने की अक्षमता का द्योतक है। अश्वघोष ने बुद्धचरित कहा है- बुद्ध ने वाराणसी में प्रवेश करके और अपने प्रकाश से नगर को दैदीप्यमान करते हुए काशी के निवासियों के मन में कौतुक भर दिया। बुद्ध वणारा के पास एक वृक्ष की छाया में पहुंचे।

प्राचीन बौद्धग्रंथों, फाहियान और ह्लेनसांग ने गया एवं उरुबिल्ला या उरुबेला (जहां बुद्ध ने छह वर्षों तक कठिन तप किया था और उनको सम्बोधि प्राप्त हुई थी) में अंतर बताया है, तथापि गयामाहात्म्य ने महाबोधितरु को तीर्थस्थलों में गिना है और कहा है कि तीर्थयात्री को उसकी यात्रा करनी चाहिए और यह बात आज तक ज्यों-के-त्यों मानी जाती है। हिंदुओं और बौद्धों के तीर्थ कब अलग-अलग हो गए, यह कहना कठिन है। बौद्धों की मान्यता है कि बोधिवृक्ष के समीप ही बुद्ध को परम ज्ञान प्राप्त हुआ था। यह बोधिवृक्ष इस विश्व का सबसे प्राचीन ऐतिहासिक वृक्ष है। इसकी एक शाखा महान अशोक (लगभग ईसा पूर्व 250 वर्ष) द्वारा लंका में भेजी गई थी और लंका के कण्डी नामक स्थान का पीपल इसी वृक्ष की शाखा है या इसका वंशज है। अंगुत्तरनिकाय एवं मज्झिम में आया है कि बुद्ध के महान शिष्य महाकच्छायन ने मथुरा में अपने गुरु के सिद्धांतों की शिक्षा दी।

विष्णु के अवतार बुद्ध
भारतवर्ष में बौद्धधर्म का लुप्त हो जाना एक अति विचित्र घटना है। यद्यपि बुद्ध ने वेद एवं ब्राह्मणों के आधिपत्य को न माना, न ही व्यक्तिगत आत्मा एवं परमात्मा के अस्तित्व में ही विश्वास किया किन्तु उन्होंने कर्म एवं पुनर्जन्म तथा विरक्ति एवं इच्छारहित होने पर संस्कारों से छुटकारा पाने के सिद्धांतों में विश्वास किया। जब बौद्धों ने बुद्ध का पूजन प्रारम्भ कर दिया, जब यज्ञीय पशुबलि एक प्रकार से समाप्त हो गई, जब सार्वभौम दयाशीलता, उदार भावना एवं आत्मनिग्रह की भावना सभी को स्वीकृत हो गई और वैदिक धर्मावलम्बियों ने बौद्ध धर्म के व्यापक सिद्धांत मान लिए, तब बुद्ध विष्णु के अवतार रूप में स्वीकृत हो गए।

कश्मीरी संस्कृत कवि क्षेमेन्द्र द्वारा 1166 ईस्वी के लगभग लिखे ‘दशावतार-चरित’ में एवं जयदेव द्वारा 1180-1200 ईस्वी के बीच लिखे ‘गीतगोविंद’ में बुद्ध विष्णु का अवतार माने गए हैं। अत: लगभग 10वीं शती में बुद्ध सारे भारतवर्ष में विष्णु के अवतार के रूप में विख्यात हो चुके थे। तब उनके अन्य-धर्मत्व की आवश्यकता प्रतीत न हुई किन्तु भिक्षु-भिक्षुणियों के नैतिक पतन से बौद्ध धर्म की अवनति की गति अति-तीव्र हो गई और अंत में मुसलमानों के आक्रमणों ने लगभग 1200 ईस्वी के आसपास बौद्धधर्म को सदा के लिए भारत से विदा कर दिया। शंकराचार्य और रामानुजाचार्य के दार्शनिक ग्रंथों ने भी बौद्ध दर्शन को अजेय तार्किक चुनौती दी है।

चार स्थल हैं पवित्र तीर्थ
महापरिनिब्बानसुत्त के अनुसार बौद्धों के चार तीर्थस्थल हैं – लुम्बिनी, बोधगया, सारनाथ और कुशीनारा। ये भगवान् बुद्ध के जन्म-स्थान, सम्बोधि-स्थल, धर्मचक्र-प्रवर्तन-स्थल एवं निर्वाणस्थल हैं। गौतम बुद्ध ने गया में सम्बोधि प्राप्त करने के उपरान्त वाराणसी के मृगदाव अर्थात सारनाथ में आकर धर्मचक्र प्रवर्तन किया।

सनातन संस्कारों को किया अंगीकार
बौद्धों में अंत्येष्टि-क्रिया की कोई अलग विधि प्रचलित नहीं थी, चाहे मरनेवाला भिक्षु हो या उपासक। महापरिनिब्बानसुत्त में बौद्धधर्म के महान प्रस्थापक की अंत्येष्टि-क्रियाओं का वर्णन पाया जाता है। वह यह है-बुद्ध के प्रिय शिष्य आनन्द ने कोई पद्य कहा, कुछ ऐसे शिष्य जो विषयभोग से रहित नहीं थे, रो पड़े और पृथ्वी पर धड़ाम से गिर पड़े और अन्य लोग (अर्हत) किसी प्रकार दु:ख को संभाल सके। दूसरे दिन आनन्द कुशीनारा के मल्लों के पास गए। मल्लों ने धूप, मालाएं, वाद्य यंत्र तथा पांच सौ प्रकार के वस्त्र आदि एकत्र किए।

मल्लों ने शाल वृक्षों के कुंज में पड़े बुद्ध के पार्थिव शरीर की प्रार्थना सात दिनों तक की और नाच, स्तुतियों, गान, मालाओं एवं गंधों से पूजा-अर्चनाएं कीं ओर वे वस्त्रों से पार्थिव शरीर को ढकते रहे। सातवें दिन वे भगवान बुद्ध के पार्थिव शरीर को दक्षिण की ओर ले चले। उसे नए वस्त्रों से ढका गया और ऊपर से रूई और ऊन के चोगे बांधे गए और फिर उनके ऊपर एक नया वस्त्र बांधा गया।

इस प्रकार वस्त्रों एवं सूत्रों के पांच सौ स्तरों से शरीर ढक दिया गया। इसके उपरान्त? एक ऐसे लोहे के तैलपात्र में रखा गया जो स्वयं एक तैलयुक्त पात्र में रखा हुआ था। इसके बाद सभी प्रकार की गंधों से युक्त चिता बनाई गई और उस पर बुद्ध का शरीर रख दिया गया। तब महाकस्सप एवं पांच सौ अन्य बौद्धों ने जो साथ में आए थे, अपने परिधानों को कंधों पर सजाया (उसी प्रकार जिस प्रकार ब्राह्मण अपने यज्ञोपवीत को धारण करते हैं)। उन्होंने बुद्धबाहु होकर सिर झुकाया और श्रद्धापूर्वक तीन बार प्रदक्षिणा की। इसके उपरान्त दाह किया गया, केवल अस्थियां बच गईं। मगधराज अजातशत्रु, वैशाली के लिच्छवियों आदि ने बुद्ध के अवशेषों पर अपना-अपना अधिकार जताना आरम्भ कर दिया।

बुद्ध के अवशेष आठ भागों में बांटे गए। जिन्हें ये भाग प्राप्त हुए, उन्होंने उन पर स्तूप (धूप) बनवाए, मौर्य लोगों ने जिन्हें केवल राख मात्र प्राप्त हुई थी, उस पर स्तूप बनवाया। एक ब्राह्मण द्रोण ने उस घड़े पर, जिसमें अस्थियां एकत्र कर रखी गई थी, एक स्तूप बनवाया। राइस डेविड्स ने कहा है कि यद्यपि ऐतिहासिक ग्रंथों एवं जन्म-गाथाओं में अंत्येष्टि का वर्णन मिलता है किन्तु कहीं भी प्रचलित धार्मिक-क्रिया आदि की ओर संकेत नहीं मिलता। ऐसा कहा जाता है कि बौद्ध अंत्येष्टि-क्रिया यद्यपि सरल है, तथापि वह आश्वलायन-गृह्यसूत्र से बहुत मिलती-जुलती है।



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