18 June 2021

Jansatta Ravivari stambh Ravivari Stambh special article on mughal emperor bahadur shah jafar – सदमात ने रोने न दिया

बात 1857 में अंग्रेजों और आजादीपसंद हिंदुस्तानियों के बीच हुई जंग से कुछ पहले की है। आखिरी मुगल बहादुरशाह जफर दिल्ली के लालकिले की हद में सिमट गए थे। अंग्रेज उन पर तरह-तरह के दबाव डाल रहे थे। उन्होंने उनकी बादशाहत पर भी सवालिया निशान लगा दिए थे। बादशाह बूढ़े हो गए थे और उनमें इतनी कुव्वत नहीं बची थी कि वे अंग्रेजों से आंख मिला कर बात कर सकें। हालात और खुद की बुजदिली ने उनको मजबूर कर दिया था कि वे अपना पुश्तैनी हक बरकरार रखने के लिए कंपनी सरकार से सिर्फ गुजारिश ही कर सकते थे। पर गोरे उनकी एक बात भी सुनने के लिए तैयार नहीं थे। तड़प कर उन्होंने एक गजल कही, जिसका पहला शेर था :

बात करनी मुझे मुश्किल कभी ऐसी तो न थी
जैसी अब है तेरी महफिल कभी ऐसी तो न थी।
जफर की शिकायत वास्तव में बताती है कि जब महफिल उजड़नी शुरू होती है, तो सबसे पहले बात करनी मुश्किल हो जाती है। लोग गाते-गाते चिल्लाने लगते हैं, औरों की जुबान कतरने में अपनी वाहवाही समझने लगते हैं। दूसरी तरफ, अच्छी महफिलों में हर तरह की बात करने की पूरी आजादी होती है और साथ में कही गई बात को सुनने और समझने वाले इल्मी लोग होते हैं। बात से बात निकलती है और एक पूरा मुशायरा जम जाता है। सभी शोरा एक-दूसरे के हुनर की दाद देते हुए अपनी तरफ से कुछ बेहतर पेश करते हैं। मुश्किल समय में बहादुरशाह की कसमसाहट उनके संदर्भ में उतनी ही जायज थी, जितनी आज है।
वे आगे फरमाते हैं-

ले गया लूटके कौन आज तेरा सब्र-ओ-करार
बेकरारी तुझे ऐ दिल कभी ऐसी तो न थी।
उनकी आंखों ने खुदा जाने किया क्या जादू
के तबीयत मेरी माइल कभी ऐसी तो न थी।
ये दो शेर जफर की मायूसी बयां करते हैं, जिसमें जब वे कहते हैं कि ‘ले गया लूट के कौन’ तो इस सवाल में ही जवाब निहित है। जिस दौर में यह शेर कहा गया था, उसमें यह रूमानी से ज्यादा सियासी बयान था। सब जानते थे कि इस मुगल की तबियत माइल क्यों और किन वजहों से हुई थी और उसकी बेकरारी क्या थी। जबरन हक छिन जाने का दर्द शेर में ‘लूट’ शब्द से जाहिर हो रहा है। साथ ही में ‘तेरी महफिल’ का जिक्र इसीलिए किया गया था, क्योंकि अपनी बात कहना या अपने हालात पर मासूम तब्सरा करना एक गुनाह हो गया था।

चश्म-ए-कातिल मेरी दुश्मन थी हमेशा लेकिन
जैसी अब हो गई कातिल कभी ऐसी तो न थी।
क्या सबब तू जो बिगड़ता है ‘जफर’ से हर बार
कंू तेरी हूर-ए-शिमागिल कभी ऐसी तो न थी।

क्रूर, निरंकुश कंपनी बहादुर के दौर में गुजर-बसर करने को मजबूर बाहदुरशाह जफर की यह गजल एक ऐतिहासिक दस्तावेज है। यह एक आम आदमी है, जो शक्ति और सत्ता के अंधे और बहरेपन के कारण बुरी तरह से प्रताड़ित महसूस कर है। एक अकेले जफर की तरह एक आम आदमी भी सत्ता से पंजा लड़ाने की मजाल नहीं रखता है। वह सब सहता रहता है, जब तक कोई मंगल पांडेय उठ खड़ा नहीं होता है।
पर आजादी की पहली लड़ाई की तरह हर दौर में उबाल आने में समय लगता है। मशहूर शायर सुदर्शन फाकिर ने सूनी आंखों के सामने से गुजरते हुए मंजर और उस पर रो न पाने की मजबूरी को कुछ इस तरह से बयां किया है-

इश्क में गैरत-ए-जज्बात ने रोने न दिया
वर्ना क्या बात थी किस बात ने रोने न दिया।
आप कहते थे कि रोने से न बदलेंगे नसीब
उम्र भर आपकी इस बात ने रोने न दिया।
रोने वालों से कहो उनका भी रोना रो लें
जिनको मजबूरी-ए-हालात ने रोने न दिया।
तुझसे मिल कर हमें रोना था बहुत रोना था
तंगी-ए-वक्त-ए-मुलाकात ने रोने न दिया।

फाकिर आज के शायर हैं, जो 2008 तक हमारे बीच थे। उनकी गजल लिखी तो रूमानी अंदाज में गई है, पर आज की तारीख में यह सियासी शिकवा है। कहर पर कहर टूट रहे हैं, पर तंगी-ए-वक्त-ए-मुलाकात और गैरत-ए-जज्बात की वजह से हम खुल कर रो भी नहीं पा रहे हैं। गैरत यहां सबसे जरूरी लफ्ज है। इश्क हो या कुछ और, सामने वाला जब जज्बात को एक पल के लिए भी बेगैरत करता है, तो उसके सामने अपना दुख रखना बेमतलब हो जाता है। और जब आपका कलेजा दर्द से भर कर फूट पड़ता है तो ‘आप कहते थे कि रोने से न बदलेंगे नसीब’ और रोने पर मनाही लगा देते हैं।
दूसरे शब्दों में, उन्होंने कभी नसीब का हवाला देकर, तो कभी गैरत-ए-जज्बात की वजह से मन का गुब्बार मन में ही दफ्न करने के लिए हमें मजबूर कर दिया है।

माशूक का आशिक से उलाहना सिर्फ दो लोगों के बीच का नहीं है, बल्कि उससे बहुत आगे तक जाता है। शायद इसलिए जब फाकिर कहते हैं कि ‘रोने वालों से कहो उनका भी रोना रो लें’, तो उनका सीधा निशाना सत्ताधीशों की तरफ है, जिनका रोना दूसरे के लिए सहानुभूति की वजह से नहीं फूट पड़ता है, बल्कि अपने लिए सहानुभूति बटोरने के लिए होता है। समय-समय पर रो देना उनकी व्यावसायिक/ पेशेवर भूमिका का हिस्सा है।
बहादुरशाह जफर हों, सुदर्शन फाकिर या हम और आप, रोना शुरू होता है महफिल में बात करने की मुश्किल से और फिर मुश्किल बढ़ती ही जाती है। जफर कहते हैं-
अबकी जो राह-ए-मोहब्बत में उठाई तकलीफ
सख्त होती हमें मंजिल कभी ऐसी तो न थी।
फाकिर के हिसाब से ‘सख्त होती हमें मंजिल’ अब एक अलग ठौर पर है, क्योंकि सदमे पर सदमा लग रहा है :
एक दो रोज का सदमा हो तो रो लें ‘फाकिर’
हमको हर रोज के सदमात ने रोने न दिया।
वैसे, हालात के संदर्भ में यह भी साथ-साथ पूछना जरूरी हो गया है-
जो दास्तान हमने अपनी सुनाई तो आप क्यों रोए?




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