14 April 2021

Jansatta Editorial comment and opinion on burning forests – धधकते जंगल

हफ्ते भर से उत्तराखंड के ज्यादातर जिलों में जिस तरह से जंगल धधक रहे हैं, उससे गंभीर खतरा खड़ा हो गया है। राज्य का बड़ा क्षेत्रफल आग की लपटों में घिरा हुआ है। हालात की गंभीरता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि आग बुझाने के लिए केंद्र सरकार ने राज्य में हेलिकॉफ्टर भेजे हैं और सेना को भी इस काम में लगाया है।

आग से वन संपदा तो नष्ट हो ही रही है, जनजीवन भी खतरे में है। कई ग्रामीण इलाकों में कच्चे घर और मवेशी भी इसमें स्वाहा हो गए। पहाड़ के जंगलों में आग की ऐसी घटनाएं कोई नई बात नहीं हैं, लेकिन पिछले कुछ सालों में जंगलों में आग की घटनाओं में जिस तरह से तेजी आई है, वह नए संकट की ओर इशारा कर रही है और यह संकट बिगड़ते पर्यावरण का भी सूचक है। आमतौर पर आग अगर बड़े पैमाने पर नहीं फैलती है तो यह अपने आप बुझ भी जाती है। लेकिन जब तेज हवा चल रही होती है तो आग को फैलने से रोक पाना संभव नहीं होता। उत्तराखंड के जंगलों में लगी आग बेकाबू हो जाने के पीछे कारण यही है कि इसने बहुत बड़े हिस्से को अपनी चपेट में ले लिया है।

भारत में हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, मध्यप्रदेश, ओड़िशा और पूर्वोत्तर के इलाकों में वनाग्नि की घटनाओं के पीछे प्राकृतिक कारण तो हैं ही, मानवीय गतिविधियां भी कम जिम्मेदार नहीं हैं। इसलिए पर्वतीय वनों में आग पर काबू पाने की चुनौती दोहरी हो जाती है। वनों में सूखी लकड़ियां, पत्तियां और घास के ढेर जैसे ही किसी भी वजह से उत्पन्न चिंगारी के संपर्क में आते हैं तो इन्हें धधकते देर नहीं लगती और फिर पेड़ों के जरिए थोड़े ही वक्त में आग बड़े इलाके को घेर लेती है। मुश्किल यह भी है कि पहाड़ी क्षेत्रों का भूगोल और बनावट बेहद जटिल होती है, इसलिए आसानी से आग लगने का पता भी नहीं चल पाता।

उत्तराखंड में स्थिति फिलहाल गंभीर इसलिए भी हो गई है कि प्रदेश के तेरह में से ग्यारह जिलों में जंगल लपटों में घिरे हैं। ऐसे में सब जगह एक साथ आग बुझाना मुश्किल काम है। घने जंगलों में पहुंच पाना यों भी आसान नहीं होता। ऐसे में नागरिक अपने प्रयासों से आग बुझाने के जो तरीके काम में लाते हैं, उनकी भी सीमाएं होती हैं। जिन घने जंगलों में लोगों और गाड़ियों का पहुंच पाना संभव नहीं होता है और जहां बड़ा क्षेत्रफल आग में घिरा हो, वहां हेलिकॉप्टर जैसे साधन इस्तेमाल किए जाते हैं। लेकिन जब आग तेजी से फैलती जाए तो ये सारे उपाय भी नाकाम होने लगते हैं।

उत्तराखंड देश के उन चुनिंदा राज्यों में है जो अपने प्राकृतिक संसाधन और जैव विविधता की समृद्धि के लिए जाने जाते हैं। वनस्पतियों और वन्यजीवों की कई दुर्लभ प्रजातियां यहां हैं। ऐसे में वन्यजीवों और वनोपज की तस्करी करने वाले और भूमाफिया भी जंगलों में आग लगाने से बाज नहीं आते। कई बार पहाड़ी इलाकों में आग के इस्तेमाल में लापरवाही भी वनाग्नि का कारण बन जाती है। पिछले पांच साल में जंगल में आग की घटनाओं में पचास फीसद से ज्यादा वृद्धि हुई है और हजारों करोड़ का नुकसान अलग। वनाग्नि की समस्या जिस तरह से गहराती जा रही है, उसे देखते हुए राज्य सरकार और वन विभाग को अपना निगरानी तंत्र और आपदा प्रबंधन दुरुस्त करने की भी जरूरत है। उत्तराखंड के गठन को लगभग दो दशक हो चुके हैं, लेकिन इतने साल बाद भी आज तक कोई ठोस वन नीति नहीं बनी, न ही ऐसी घटनाओं से कोई सबक लिया गया। इसलिए ये लपटें हमें झुलसा रही हैं।




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