14 April 2021

Jansatta Editorial article in dunia mere aage column on nature election – प्रकृति का पाठ

घूमती पृथ्वी पर प्रकृति का दायरा पसरा है और हम सब जब-तब निकल पड़ते हैं दुनिया को देखने। दुनिया के रंग में अपना ही रंग होता। हम जो कुछ बाहर संसार में देखने जाते हैं, वही हमारे भीतर भरता रहता। प्रकृति को कितना देखते हैं, किस तरह देखते हैं? क्या केवल एक चलते राही की तरह देखते हैं या प्रकृति के बीच रह कर जीवन को समझने की कोशिश करते हैं? यह सब कुछ संभव होता है हमारे समय और स्वभाव पर कि हम किस तरह संसार को देखते हैं। संसार को देखना ही काफी नहीं होता, उसे जीना भी पड़ता है। यह जीना ही संसार, जीवन और आदमी के लिए महत्त्वपूर्ण होता है।

प्रकृति को जब जीने की कोशिश करते हैं तो प्रकृति हमारे भीतर रचनात्मकता भरती है। प्रकृति हर क्षण कुछ न कुछ नया रचती रहती है। इसलिए प्रकृति को एक बार देख कर कुछ नहीं कहा जा सकता। यहां रुक कर आश्चर्य के साथ प्रकृति को देखते समय हम जीवन रंगों और जीवन की छवियों को देखते हैं। यहां आश्चर्य का संसार सहज ही आ जाता है। जी भर कर देखते रहने से प्रकृति हमारे भीतर उतर जाती है। यहां जीवन भर कुछ न कुछ स्पंदित होता रहता है। इसे किस तरह और कैसे देखना है, यह हम पर निर्भर करता है। प्रकृति के साथ चलते-चलते हम सीधे जीवन संसार में आ जाते हैं। यहां हम संसार के जितने हिस्से को देखते रहते हैं, वह हमारे भीतर जीवन की तरह आ जाता है। प्रकृति को समझने के क्रम में हम जीवन का पाठ पढ़ते रहते हैं।

यहां नयापन, ताजगी और रचना का संसार होता है। आदमी की आंख में प्रकृति का रचा-बसा संसार ही एक संसार के लिए जगह बनाता है। जो कुछ देखते हैं वही हमारे भीतर भरता है। समसार को छोड़ कर या तटस्थ रह कर संसार की प्रकृति या दुनिया को देखने की कोई बात नहीं होती। यह जीवन संसार ही हमारे लिए रचना का संसार बनाता है। प्रकृति की सुंदरता में जीवन की सहजता और सुंदरता छिपी होती है। प्रकृति के साथ सब होते हैं। सब जीते भी हैं प्रकृति को। पर प्रकृति के साथ हमारा जो रिश्ता है, उसमें सब शामिल होकर। सब प्रकृति को जीये और उसके रंग में रंगे तो बात बनती है। दरअसल, प्रकृति हम सबकी मां है… जीवन है। उसी के सहारे पर हम सब होते है। प्रकृति स्पंदित होती है… हमें हमारे प्राण से मिलाती है। इसे छोड़ कर या भुला कर किसी भी अस्तित्व की कल्पना नहीं की जा सकती है।

जीवन के सुख-दुख में हमारे हर भाव के साथ प्रकृति खड़ी रहती है। जब भीषण गर्मी से मैदानी इलाकों में लोग परेशान होते हैं तो प्रकृति की गोद हिमालय में चले जाते हैं। राहत मिल जाती है। पहाड़ी चट्टानों और पर्वतीय स्थलों की फोटो खींचते हैं। ‘नेचर विद सेल्फी’ की बहार आ जाती है। एक तरह से मुग्ध भाव से हम प्रकृति के गुण गाते रह जाते हैं, पर इतना ही काफी नहीं है। हमें प्रकृति के साथ उसके साझेपन को बराबर जीना होगा। तभी हम और पृथ्वी जीवित होंगे… जीवित रहेंगे।

प्रकृति हमारे साथ चलती रहती है। यह हम पर है कि उसके लिए हम कितना कुछ छोड़ते हैं। हमारे आसपास जमीन होना चाहिए। केवल कंक्रीट के जंगल से काम चलने वाला नहीं है। इसके आसपास माटी का संसार होना उतना ही जरूरी है, जितना जीवन के लिए हवा-पानी। इस संसार में जानने और देखने के लिए बहुत कुछ है। प्रकृति हर पल नए सिरे से सजती है। यह हमारे देखने पर है कि हम कितना संसार देखते हैं। इसके लिए कितना समय निकालते हैं। हमें लगातार अपने आसपास की दुनिया को जिद के साथ देख लेना चाहिए। जिद के साथ आगे बढ़ना, अपने होने को सिद्ध करना और प्रकृति के बीच चलना एक तरह से मानव धर्म ही निभाना होता है। यहां अकेले नहीं होते, हमारे साथ पूरी प्रकृति होती है।

इस दुनिया में हम होते हैं। साथ में हमारा अस्तित्व। जीवन, प्राण, प्रकृति। प्रकृति के किनारे पर जाते ही एक उर्जा… एक शक्ति हमारे भीतर बस जाती है। एक विराटता का भाव आ जाता कि हमारा संसार वही नहीं है जो घर संसार के भीतर बसा है। एक घर वह भी है, जिसमें हम हैं और हमारे साथ नदी, पहाड़, पेड़ और वे सारे प्राकृतिक अवयव, जिनके होने मात्र से ही हमारा होना संभव होता है। पढ़ना-पढ़ाना रूटीन काम तो होता रहेगा। गैर रूटीन के काम भी बहुत मूल्यवान हो जाते हैं, जब उसमें सबको शामिल करते हैं।
पृथ्वी कितनी सुंदर है।

कितने रंग हैं धरती के कि पूछिए मत। दूर तक क्षितिज पर धरती ही दिखाई देती है। धरती का एक सिरा अपने पैरों के नीचे से जाता है और दूसरा सिरा अनंत की दूरी पर अनंत रंगों से घिरा हुआ है। जितना ही इन रंगों के पास जाते हैं, जीने की चाह बढ़ जाती है। शुरू से प्रकृति के गोंद में मानव खेलता रहा है… प्रकृति अपने ढंग से दुलराती रही है। इसके किनारे पर जो आया, वह खाली नहीं गया। इस तरह गया जैसे कि पूरा जीवन जी लिया हो। भीतर तक प्रकृति भर देती है। रंग देती है… जीवन के अनंत रंगों से।




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