18 June 2021

Jansatta Editorial article in dunia mere aage column on importance of words in Common language – शब्दों के संदर्भ

सूर्य प्रकाश चतुर्वेदी
शब्द का कोई एक अर्थ नहीं होता, बल्कि अनेक अर्थ होते हैं। ठीक उल्टा अर्थ भी होता है। खासकर उर्दू शायरी में। मसलन एक शेर है- ‘दिल अभी पूरी तरह टूटा नहीं, दोस्तों की मेहरबानी चाहिए।’ यानी दोस्त अगर दिल तोड़ने की कोशिश करने की मेहरबानी करते तो दिल पूरी तरह टूट सकता है। इसी तरह खुमार बाराबंकवी की गजल है, जिसमें ‘मजा’ शब्द हर शेर में है और उसका मतलब तकलीफ, कीमत, दर्द, परिणाम या नतीजा है। ‘इक पल में इक सदी का मजा हमसे पूछिए।’ इस गजल में हर शेर में जब मजा शब्द आता है तो उसके विपरीत अर्थ से ही मतलब समझ में आता है। मसलन ‘रोशनी का मजा’ या ‘मुखबिरी का मजा’ अथवा ‘किश्तों में खुदकुशी का मजा’। इसी तरह दोस्ती और दुश्मनी के अर्थ भी एक दूसरे के पर्याय बन जाते हैं। मसलन ‘हम सदा दुश्मनी से दूर रहे, दोस्त कब दोस्ती से बाज आएं।’ जाहिर है यहां दोस्ती से मतलब दुश्मनी से है।

दरअसल, शब्द का अर्थ संदर्भ, परिस्थिति, आशय और अंदाज पर निर्भर करता है। सीधी सपाटबयानी का लोग आम जीवन में उपयोग करते हैं। सामाजिक सरोकार और विद्वानों की सभा में शब्द चुन-चुन कर और सोच-विचार के बाद ही शब्दों का उपयोग किया जाता है। ‘महामहोपाध्याय’ का प्रयोग अद्वितीय व दुर्लभ विद्वान के लिए किया जाता है। पर व्यंग्य में इस शब्द का प्रयोग निरक्षर और मूर्ख व्यक्ति के लिए होता है। लोग मजाक में कहते पाए जाते हैं कि देखो, वह सामने महामहोपाध्याय यानी मूर्खाधिराज चले आ रहे हैं। इसलिए समझने के लिए संदर्भ का भाव होना जरूरी है।

‘स्मार्ट’ शब्द का भी दो तरह से इस्तेमाल होता है। अच्छे अर्थ में ‘स्मार्ट’ का मतलब तेज, तीव्रबुद्धि वाला और समझदार या होशियार व्यक्ति के लिए प्रयोग किया जाता है। मगर जैसे-तैसे किसी भी कीमत पर और कुछ भी करके अपना काम निकालने वाले को भी ‘स्मार्ट’ कहा जाता है, पर वह मतलबी और स्वकेंद्रित व्यक्ति के लिए प्रयोग में लाया जाता है। यह भी होता है कि आमतौर पर हास्य कवि अजीबो-गरीब उपनाम रखते हैं। जैसे ढपोरशंख, दीवाना, पागल, हंसोड़, हुल्लड़, भिखारी, बिच्छू, छछूंदर, सांप आदि। इसका मतलब नहीं कि जैसा उनका उपनाम बताया है, वे वैसे ही हैं। शेक्सपियर के ‘क्लाउन’ यानी विदूषक, मूर्ख-हंसोड़ चरित्र के बारे में कहा जाता था कि वह नाम का ही मूर्ख था, वास्तव में वह सर्वाधिक बुद्धिमान व्यक्ति था।

जिस तरह एक शब्द में एक से अधिक अर्थ निहित होते हैं, उसी तरह एक व्यक्ति में एक से अधिक व्यक्ति निहित होते हैं। निदा फाजली ने कहा भी है- ‘हर आदमी में होते हैं दस बीस आदमी, जिसको भी देखना हो, बार-बार देखना।’ यानी जिस तरह एक शब्द का अर्थ उसके सही संदर्भ में ही जाना जा सकता है, उसी तरह एक व्यक्ति में भी ठीक से और सही तौर पर जानने-पहचानने के लिए उसे कई संदर्भों और परिस्थितियों में जानना-समझना होता है। आदमी का ‘मूड’ कभी अच्छा हो तो वह आपको प्रभावित करता है और ‘मूड’ उखड़ा हुआ हो तो वह आपको हताश और निराश ही करेगा। इसी के साथ आपकी खुद की मन:स्थिति पर भी बहुत कुछ निर्भर करेगा। तभी तो एक व्यक्ति के बारे में अलग-अलग लोगों की राय अलग-अलग होती है।

अगर कोई आपसे कहे कि अमुक-अमुक व्यक्ति गरीब तबीयत का है, तो इसका यह मतलब नहीं कि वह आर्थिक रूप से गरीब है। उसका आशय यह है कि वह व्यक्ति सीधा-सादा और सरल स्वभाव का है। कुछ लोग अतिविनम्रता में खुद का नाचीज या गरीब कहते हैं। उसका भी अर्थ शाब्दिक न लेकर भावार्थ या इरादे के संदर्भ में लिया जाना चाहिए। कुछ खुद को खाकसार भी कहते हैं। यह भी विनम्रतावश ही कहा जाता है। वरना शब्द के हिसाब से तो जगह-जगह की खाक से गुजरा हुआ माना जाएगा। एक बड़े शायर ने एक बार कहा कि एक शेर इस नाचीज और खाकसार का भी सुन लीजिए और शेर था ‘उस चश्मेलब को नींद न आए खुदा करे, जिस चश्मेलब को ख्वाब में दरिया दिखाई दे’ तो बहुत से लोगों ने शेर पर दाद तो दी, पर वे यही बतियाते रहे कि इतना अच्छा शेर कहने वाला भला नाचीज या खाकसार कैसे हो सकता है। कुछ लोग ऐसे भी थे कि कैसा शायर है जो मुराद करता है कि उसकी खूबसूरत महबूबा को नींद ही नहीं आए।

विशेषण भी शब्द हैं। शायद हिंदी में विशेषणों का सबसे अधिक दुरुपयोग होता है। कुछ तो भावनावश कुछ सामाजिक प्रतिष्ठा के दिखावे के कारण और कुछ ताकतवर लोगों की दहशत के कारण। दिवगंत व्यक्ति के लिए स्वर्गवासी, ब्रह्मालीन जैसे विशेषणों का प्रयोग आमतौर पर होता है। तो क्या सभी दिवंगत व्यक्ति स्वर्ग ही जाते हैं, फिर चाहे वे निजी जिंदगी में कितने ही अवांछनीय और अपराधी पृष्ठभूमि के क्यों न रहे हों? तो फिर नरक में कौन जाता है? मरने वाले के प्रति हम इतने अति दयावान और कृपालु हो जाते हैं। जिंदगी भर लड़ाई-झगड़े करने वाले व्यक्ति को गुजर जाने के बाद अजातशत्रु कहा जाता है। कुछ शब्दों का प्रतीक रूप में भी प्रयोग होता है। इनमें- मयखाना, शराब, दीया, हवा, रोशनी प्रमुख हैं।



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