18 June 2021

Jansatta Editorial article in dunia mere aage column on Childhood mischief and fun – बचपन का आसमान

बुलाकी शर्मा
दूसरी कक्षा में पढ़ने वाले मेरे पौत्र पर मेरी डांट का कोई असर नहीं होता। कभी डांटता भी हूं तो वह मुस्कराने लगता है। कोरोना के कहर के डर से सारे स्कूल बंद है। आस-पड़ोस के दोस्तों के साथ खेलने के लिए घर से बाहर निकलने पर पाबंदी है। घर में रहेगा तो अपने मन मुताबिक काम करेगा और डांट खाएगा। उसे डांटने के अवसर बराबर उपस्थित रहते हैं। उसकी दादी और मां भी इस अवसर का ‘लाभ’ उठाती रहती हैं! अपनी मां या पिता का मोबाइल लेकर गेम खेलने लगता है तो थोड़ी देर बाद ही उसे डांट पड़ जाती है।

गुस्साया-सा वह टीवी चला कर अपनी पसंद का कार्यक्रम देखने लगता है। फिर डांट पड़ती है कि ज्यादा मत देखा करो… आंखें खराब होती हैं। हमारे गुस्से या खीझ की वजह दूसरी होती है, लेकिन उसे हम बच्चों को डांट कर अक्सर उतारते हैं। कभी-कभी मैं भी अपने पौत्र को डांटता हूं, लेकिन वह गुस्सा नहीं होता। मुस्कुराते हुए कहता है- ‘आपको तो डांटना ही नहीं आता दादाजी।’ फिर वह बताता है कि जब दादी या मां डांटती हैं, तब उनकी तेज आवाज के साथ उनकी आंखें भी गुस्से में होती हैं। इसलिए मैं भी गुस्सा हो जाता हूं। जब आप डांटते हैं, तो आपकी आवाज जरूर तेज होती है, लेकिन आपकी आंखें मुस्कुराती रहती हैं। लगता है आप झूठ-मूठ मुझे डांट रहे हैं।’

शायद आपके बच्चे भी आपके बारे में ऐसा ही सोचते होंगे, इसलिए उन पर आपकी डांट कई बार असरहीन होती होगी। सच में, बच्चों की अंतर्दृष्टि बहुत गहरी होती है। वे हमारे मन के भावों को तत्काल जान जाते हैं। मैं बच्चों की गलती देख कर भी उन पर गुस्सा नहीं कर सकता, इसीलिए मेरे आस-पड़ोस के बच्चे अपने माता-पिता या दादा-दादी की भी मुझसे शिकायत करते हैं।

बच्चों को डांटने की जगह हमें प्यार से समझाना चाहिए। उन जैसा बन कर उनकी जिज्ञासु वृत्ति को प्रोत्साहित करना चाहिए। लेकिन हम उनकी जिज्ञासा की अनदेखी करते हुए बात-बात पर उन्हें रोकते-टोकते रहते हैं, नसीहत देते और डांटते रहते हैं, जिससे वे गुस्सा होते हैं। धीरे-धीरे जिद्दी भी होने लगते हैं। बच्चों का स्वभाव है कि जिस काम के लिए हम उन्हें मना करेंगे, वे उसी काम को करना चाहेंगे। उनके मन में प्रश्न खड़ा हो जाएगा कि इस काम में ऐसा क्या है जो उन्हें रोका गया।

वे अपने मन की जिज्ञासा शांत करना चाहते हैं, लेकिन हमें उनकी यह मनमानी लगती है। हम उन्हें डांटने लगते हैं, उन पर गुस्सा करने लगते हैं। हमारी कोशिश खुद को उन पर आरोपित करने की रहती है। अपने अधूरे सपने पूरे कराने की उनसे हम आकांक्षा पाले रहते हैं। इसलिए उन्हें हम अपने सपनों के अनुरूप बनाना चाहते हैं। उनकी तुलना हम किसी और से करते हैं और उन्हें उसी तरह बनाने की चेष्टा करते हैं। जबकि बच्चे किसी और की तरह नहीं, अपनी तरह ही बने रहना चाहते हैं। बच्चों के मनोभावों को कवि डोरोथी एल्डिस ने कितनी प्रभावी अभिव्यक्ति दी है- ‘सभी कहते हैं कि मैं मां जैसा दिखता हूं/ सभी कहते हैं कि मेरी छवि आंट बिया जैसी है/ सभी कहते हैं कि मेरी चाल पिता जैसी है/ पर मैं तो स्वयं की तरह दिखना चाहता हूं।’

बच्चा सिर्फ अपनी तरह दिखना चाहता है। अपने मन के अनुसार काम करना चाहता है, मगर हम उसकी रुचियों को दबा कर अपनी चाहत के अनुसार बनाने की कोशिश में उसके मन की खुशियां छीन लेते हैं। अगर उसकी रुचि चित्रकला, साहित्य, संगीत, गायन आदि में है तो ऐसे अभिवावक कम ही होंगे जो उसे प्रोत्साहित करेंगे, क्योंकि हममें से अधिकतर को लगता है कि कला के इन क्षेत्रों में नाम तो है, लेकिन दाम यानी आमदनी नहीं है। हमारी सोच ही ऐसी बनी हुई है।

कवियों, लेखकों, गायकों, संगीतज्ञों, चित्रकारों आदि का हम सम्मान जरूर करते हैं, लेकिन उनके संघर्ष, उनकी कमजोर आर्थिक स्थिति के किस्से सुन कर अपने बच्चों को उनसे दूर रखना चाहते हैं। उसे डॉक्टर, इंजीनियर, उच्च प्रशासनिक, पुलिस या सैन्य अधिकारी या किसी बड़ी कंपनी में बड़े ओहदे पर देखने की हमारी लालसा उसकी रुचियों का दमन कर देती है।

खलील जिब्रान ने कहा था- ‘तुम उन्हें प्यार दे सकते हो विचार नहीं, क्योंकि उनके पास अपने विचार होते हैं। तुम उनका शरीर बंद कर सकते हो आत्मा नहीं, क्योंकि उनकी आत्मा आने वाले कल में निवास करती है। तुम उसे देख नहीं सकते, सपनों में भी नहीं देख सकते। तुम उनकी तरह बनने का प्रयत्न कर सकते हो, लेकिन उन्हें अपनी तरह बनाने की कोशिश मत कर रखना, क्योंकि जीवन पीछे की ओर नहीं जाता और न बीते हुए कल के साथ ही रुकता है।’

दरअसल, हम जो खुद नहीं बन सके, जो सपने पूरे नहीं कर सके, उन सपनों को हम अपने बच्चों से पूरा कराना चाहते हैं। हम यह भूल जाते हैं कि अपने बच्चों के सपनों की बलि देकर उनसे अपने अधूरे सपने पूरे करने की हमारी आकांक्षा उनके नैसर्गिक विकास को अवरुद्ध कर देगी। वह न अपनी रुचि के अनुसार आगे का मार्ग तय कर सकेगा और न ही हमारे अधूरे सपने पूरे कर सकेगा।



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