13 June 2021

jansatta chaupal and readers opinion on water mismanagement – कुप्रबंधन का पानी

समूची दुनिया आज जल संकट के प्रबंधन में प्राकृतिक और स्थानीय समाधान पर बल दे रही है, क्योंकि अब साबित हो चुका है कि आवश्यकता और लालच में व्यक्ति को एक को ही चुनना पड़ेगा। प्रकृति से वैमनस्यता करके मानव जीवन अधिक दिनों तक इस धरती पर जीवित नहीं रह सकता, यह भी दिखाई दे रहा है। धरती का करीब तीन चौथाई भाग जल से घिरा हुआ है, मगर इसमें से पनचानबे फीसद पानी खारा है जो पीने योग्य नहीं है। नगरीकरण और औद्योगीकरण की तीव्र गति, बढ़ता अगाध प्रदूषण और जनसंख्या में लगातार वृद्धि के साथ हरेक व्यक्ति के लिए पेयजल की उपलब्धता सुनिश्चित कराना एक बड़ी चुनौती है।

जैसे-जैसे गर्मी बढ़ रही है, देश के कई हिस्सों, खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में इसकी विकरालता हर पिछले वर्ष के सूचकांक को लांघती नजर आती है। आज भी शहरों में फर्श चमकाने, गाड़ी धोने और गैर-जरूरी कार्यों में पानी को निर्ममतापूर्वक बहाया जा रहा है, जबकि राजस्थान, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, ओड़ीशा, झारखंड जैसे राज्यों के सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में गर्मी के दिनों में पेयजल की भयंकर समस्या व्याप्त है। कहीं-कहीं तो ग्रामीणों खासकर महिलाओं को दो से तीन मील की दूरी तय करके घरेलू उपयोग और पीने के लिए जल की व्यवस्था करनी पड़ती है। स्वतंत्रता के तिहत्तर वर्ष बाद भी देश के दूर-दराज के नागरिकों को जल के लिए संघर्ष करना दुर्भाग्यपूर्ण ही है।
पिछले दिनों एक खबर आई कि छत्तीसगढ़ के बलरामपुर जिले के चरचरी गांव में हर साल गर्मी शुरू होते ही पानी की भारी किल्लत होने लगती है।

प्यास से व्याकुल ग्रामीण नदी-नालों के किनारे रेतीली जमीन खोद कर पानी निकालते हैं और फिर उसे कपड़े से छान कर पीने योग्य बनाते हैं। यह गंभीर चिंता का विषय है कि ऐसा दूषित जल ग्रामीणों के स्वास्थ्य को किस हद तक कुप्रभावित करता होगा। यह तो एक बानगी है, जबकि देश के हजारों-लाखों गांव में पेयजल के लिए हाहाकार मचना राज्य और केंद्र सरकार के पेयजल प्रबंधन नीति और रीति पर सवालिया निशान खड़ा करता है।

देश के ग्रामीण इलाकों में इस जल संकट की त्राहिमाम स्थिति के कारण शहरों की ओर नागरिक पलायन को मजबूर हो रहे हैं। सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल की मार झेल रहे मजदूरों की संख्या सबसे ज्यादा है। आंकड़े बताते हैं कि ग्रामीण क्षेत्रों में पैंसठ से सत्तर फीसद लोग प्रदूषित पानी पीने को मजबूर हैं। इजराइल जैसे देश ने आधुनिक तकनीक के सहारे खारे पानी को पीने योग्य बनाकर विश्व को संदेश दिया है। पता नहीं जल शक्ति मंत्रालय ने इस दिशा में कोई कारगर योजना बना कर पेयजल के संकट को दूर करने में कोई योजना बनाई या यह विषय कागज के पन्नों में सिमट कर रह गया।

गौरतलब है कि करीब साठ करोड़ से अधिक भारतीय पहले ही पानी की कमी से जूझ रहे हैं। जरूरत इस बात की है कि केंद्र सरकार सबसे पहले सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों के पेयजल संकट से प्रभावित परिवारों का गहन सर्वेक्षण कराए, प्राथमिकता के आधार पर दीर्घकालिक पेयजल योजना बना कर उसे कार्यान्वित करे। बुनियादी सवाल यह भी है कि ऐसे दुरूह क्षेत्रों से निर्वाचित विधायकों और सांसदों की तंद्रा क्यों नहीं टूट रही है कि वे कई दशकों से विकराल प्राण रक्षक जल व्यवस्था में अपनी भूमिका दर्ज करें। जो सरकार अपने नागरिकों को पीने योग्य पानी मुहैया नहीं करा सकती, उससे कुछ और उम्मीद करना तो दिन के उजाले में सुनहरे सपने देखने जैसा ही है।
अशोक कुमार, पटना, बिहार



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