14 April 2021

jansatta chaupal and readers opinion on Election language-चुनावी भाषा

बंगाल, असम, केरल, तमिलनाडु और पुदुचेरी समेत पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों की सगरर्मी अपने चरम पर है। हर राजनीतिक दल साम-दाम-दंड भेद से अगली बार सत्ता में आने की मंशा दिखा रहा है।

कोई अपना गोत्र बता रहा है, तो कोई धर्मस्थलों के चक्कर काट रहा है। बाहरी-भीतरी के आरोप-प्रत्यारोप मढ़े जा रहे हैं। विकास एक ऐसा शब्द है, जो तीन अक्षर से बना है और इस शब्द का बड़ा नाम सुना है और सुनाया जाता है। लेकिन लगता है कि हमारे राजनेताओं ने व्यवहार में अपने शब्दकोष से इस शब्द को हटा दिया है।

आखिर चुनाव के समय वे क्यों गैरजरूरी मुद्दों को उछालने पर विवश हैं। बात मतदाताओं जैसी ही सीधी और सरल है। अगर सरकार ने विकास का काम क्या होता तो आज दावे के साथ वह अपने कामों को गिना सकती थी। खैर, मतदाता किसी लोकतंत्र का सबसे ताकतवर प्राणी होता है।

अगर वह सत्ता तक पहुंच सकता है, तो उसकी सुध न लेने पर सत्ता की मदद न करने कि उसे सुधि भी आ सकती है। ऐसे में विधानसभा चुनावों में गैर विकास से जुड़े बढ़ते मुद्दे और राजनेताओं की बदलती रंगत की पड़ताल हम सबके लिए बड़ा मुद्दा है।
’सदन, पटना विवि, बिहार

आखिरी दौर में

देश के कोयला उद्योग के लिए कोयला खान पेंशन योजना 98 लागू है, जिसके तहत अधिकारियों को तात्कालिक वेतन की चौथाई अचल सेवानिवृत्ति पेंशन दी जाती है। जिस देश में वंचितों की बहुत बड़ी आबादी हो, वहां कोयला अधिकारियों की पेंशन योजना पर चर्चा बेमानी होग।

फिर भी देश को मालूम होना चाहिए कि खून-पसीने जला कर देश को रोशन करने वाले पूर्व अधिकारियों की जिंदगी की शाम कैसे गुजर रही है। वर्षों से बगैर फेर-बदल वाली पेंशन योजना महंगाई की बोझ से सिकुड़ती चली गई। परिवर्तनशील वैश्विक अर्थव्यवस्था में पंद्रह साल पीछे निर्धारित पेंशन को छोड़ सब सब गतिमान है। अनुमान लगाना सहज है कि देश की जटिल अर्थशास्त्रीय समीकरणों ने जिंदगी के सारे गणित बिगाड़ दिए हैं।

पेट्रोल की बढ़ती कीमत और गैस की घटती सबसिडी जैसे वित्तीय झटके सहते पेंशन में बदलाव की मांग अनसुनी रह गई। बढ़ती उम्र और बाजार के थपेड़ों ने बुजुर्गों की जुबान तक छीन ली है। सरकार और देश की सबसे बड़ी कोयला कंपनी का अपने पूर्व खनिकों के प्रति उदासीनता चिंताजनक है। अगर यह बदलता चेहरा इसी रफ्तार से आगे बढ़ता रहा तो यह देश और समाज किस मुकाम पर पहुंचेगा!
’एमके मिश्रा, रातू, रांची, झारखंड




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