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ISRO के लिए आखिर कितना अहम साबित हुआ मिशन चंद्रयान 2 ? दर्ज हुईं ये 5 उपलब्धियां

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कहते हैं कि विज्ञान में विफलता नहीं होती है, केवल प्रयोग और प्रयास होते हैं। और हर प्रयोग से कुछ नया सीखने को मिलता है, ताकि अगला प्रयोग और बेहतर तरीके से हो सके। भारतीय अंतरिक्ष एजेंसी इसरो के वैज्ञानिकों के लि भी चंद्रयान 2 के प्रयोग से काफी कुछ सीखने को मिला। कई चीजें पहली बार हुई, तो कई टेक्नोलॉजी पहली बार विकसित की गई। इतना ही नहीं इस मिशन के साथ ही इसरो के नाम 5 बड़ी उपलब्धियां भी दर्ज हो गई हैं। तो आइए जानते हैं उन उपलब्धियों के बारे में।

नंबर एक- पहली बार बनाया लैंडर और रोवर

रूस के इनकार के बाद इसरो के वैज्ञानिकों ने खुद से अपना लैंडर-रोवर बनाने का फैसला किया। इसरो वैज्ञानिकों ने दोनों को बनाया भी। खुद ही रिसर्च किया और उसका डिजाइन तैयार किया। हालांकि इन सबमें करीब 11 साल लग गए। रोवर को जहां हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड ने बनाया, तो वहीं, विक्रम लैंडर की शुरुआती डिजाइन इसरो के स्पेस एप्लीकेशन सेंटर अहमदाबाद ने बनाया था। बाद में इसे बेंगलुरु के URSC ने विकसित किया।

नंबर दो- चांद के दक्षिणी ध्रुव पर पहली बार भेजा मिशन

भारत दुनिया का पहला देश है और इसरो दुनिया की पहली स्पेस एजेंसी है, जिसने चांद के दक्षिणी ध्रुव पर अपना यान पहुंचाया है। इससे पहले ऐसा किसी भी देश ने नहीं किया। भले ही मिशन पूरी तरह से सफल न हुआ हो, लेकिन विक्रम लैंडर चांद के दक्षिणी ध्रुव पर अब भी है।

नंबर तीन- पहली बार लैंडर-रोवर-ऑर्बिटर की एकसाथ लॉन्चिंग

इसरो वैज्ञानिकों ने पहली बार इतने वजन का सैटेलाइट लॉन्च किया। आमतौर पर किसी सैटेलाइट में एक ही हिस्सा होता है। लेकिन, चंद्रयान-2 में तीन हिस्से थे। ऑर्बिटर, विक्रम लैंडर और प्रज्ञान रोवर। तीनों को एकसाथ इस तरह से जोड़ना था कि चंद्रयान-2 कंपोजिट मॉड्यूल बनकर जीएसएलवी-एमके3 रॉकेट के पेलोड फेयरिंग में आसानी से फिट हो जाए। इस काम में भी हमारे वैज्ञानिकों ने सफलता हासिल की। जबकि ये काम आसान नहीं होता।

नंबर चार- पहली बार प्राकृतिक उपग्रह पर लैंडर-रोवर भेजा

इसरो ने चंद्रयान-2 से पहले तक किसी उपग्रह पर लैंडर या रोवर नहीं भेजा था। ये पहली बार है कि इसरो के वैज्ञानिकों ने किसी प्राकृतिक उपग्रह पर अपना लैंडर और रोवर भेजा।

और नंबर पांच- पहली बार सेलेस्टियल बॉडी पर लैंड करने की तकनीक बनाया

इसरो वैज्ञानिकों ने पहली बार किसी सेलेस्टियल बॉडी, यानी अंतरिक्षीय वस्तु पर अपना यान लैंड कराने कि तकनीक विकसित की। क्योंकि, पृथ्वी को छोड़कर ज्यादातर सेलेस्टियल बॉडी पर हवा, गुरुत्वाकर्षण या वातावरण नहीं है। ऐसे में विपरीत परिस्थितियों में किसी अंतरिक्षीय वस्तु पर अपना यान उतारने की तकनीक विकसित करना बड़ी चुनौती थी।

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