18 June 2021

How can future of India can be structured wisely tells former SC Judge Markandey Katju – भारत का भविष्य

आज भारत एक पिछड़ा गरीब देश है, जिसमें व्यापक गुरबत, बेरोज़गारी, महंगाई, कुपोषण, स्वास्थ लाभ और अच्छी शिक्षा का अभाव आदि है। इस देश को कैसे एक शक्तिशाली विकसित देश में परिवर्तित करें, ताकि यहां के लोग खुशहाल हों और अच्छा जीवन व्यतीत कर सकें? यही सभी देशभक्त लोगों का उद्देश्य होना चाहिए। इस विषय पर गहरी चिंतन की आवश्यकता है।

औद्योगिक क्रांति, जो इंग्लैंड में 18वीं सदी में शुरू हुई, और उसके बाद सारी दुनिया में फैल गयी, से पहले हर देश में सामंती समाज होते थे। सामंती अर्थव्यवस्था में पैदावार के साधन इतने पिछड़े थे कि उनके द्वारा बहुत काम पैदावार हो सकती थी। भारत में हल से, यूरोप में घोड़ों से और वियतनाम में भैंसों से जमीन जोती जाती थी, इसलिए सामंती समाज में केवल कुछ ही लोग (राजा और जमींदार आदि) संपन्न हो सकते थे और बाकी को ग़रीब रहना होता था। यह परिस्थिति औद्योगिक क्रांति के बाद बिलकुल बदल गयी। अब आधुनिक उद्योग इतने बड़े और शक्तिशाली होते हैं कि उनसे इतना पैदावार हो सकता है कि अब किसी को ग़रीब रहने की आवश्यकता नहीं है। दुनिया के सभी लोग खुशहाल जिंदगी पा सकते हैं। इस परिस्थिति के बावजूद दुनिया के 70-75% लोग गरीब हैं और बेरोज़गारी, कुपोषण, स्वास्थ लाभ और अच्छी शिक्षा का अभाव, आदि का शिकार हैं।

वास्तव में इस दुनिया में दो दुनिया हैं, विकसित देशों की दुनिया (उत्तर अमरीका, यूरोप, जापान, ऑस्ट्रेलिया और चीन आदि) और अविकसित देशों की दुनिया, जिसमें भारत भी आता हैI सभी देशभक्तों का उद्देश्य भारत को विकसित देश बनाना होना चाहिए। यह कैसे किया जाए, यही मुख्य समस्या है। आज भारत के पास वह सब है, जिससे हम इस महान ऐतिहासिक परिवर्तन कर सकें- वैज्ञानिकों और अभियंताओं का एक विशाल समूह और अपार प्राकृतिक संपदा। परन्तु हम फिर भी ग़रीब हैं। ऐसा क्यों? इसे समझने के लिए हमें कुछ गहराई में जाना होगा और अर्थशास्त्र समझना होगा, क्योंकि जैसा महान रुसी नेता लेनिन ने कहा था ‘राजनीति संकेंद्रित अर्थशास्त्र होती है’ (Politics is concentrated Economics)।

श्रम का दाम (Cost of Labour) पूरे पैदावार के दाम (Cost of Production) का बड़ा अंश होता है, इसलिए जिस उद्योगपति या व्यापारी के पास सस्ता श्रम है वह अपने उस प्रतिद्वंदी से सस्ता माल बेच सकता है जिसके पास महंगा श्रम है और प्रतिस्पर्धा (Competition) में उसे हरा सकता है। उदाहरणस्वरूप, चीन में 1949 में क्रांति हुईI इसके पहले चीन एक पिछड़ा ग़रीब सामंती देश था, पर इसके बाद चीन के नेताओं ने एक विशाल आधुनिक औद्योगिक आधार का निर्माण किया। अपने सस्ते श्रम के कारण चीन के विशाल उद्योगों ने दुनिया भर के बाज़ारों पर कब्ज़ा कर लिया है।

पश्चिमी देश के उद्योग चीनी उद्योगों से प्रतिस्पर्धा नहीं कर सके क्योंकि पश्चिमी श्रम महंगा है और इसलिए कई पश्चिमी उद्योग बंद हो गए। इसलिए जिस देश में सस्ता श्रम है, वह अगर एक विशाल औद्योगिक आधार बना दे तो वह जिन देशों में महंगा श्रम है उनको प्रतिस्पर्धा में हरा सकता है। भारत के पास तो चीन से भी सस्ता श्रम है, इसलिए अगर भारत एक विशाल औद्योगीकरण कर ले तो विकसित देश का क्या होगा जहां महंगा श्रम है? उनके अनेक उद्योग बंद हो जाएंगे और लाखों करोड़ों कर्मचारियों को बर्खास्त करना पड़ेगा। क्या ऐसा विकसित देश होने देंगे? कतई नहीं।

विकसित देशों में एक गुप्त अलिखित नियम है: भारत को कभी विकसित देश नहीं बनने देना है, अन्यथा अपने सस्ते श्रम के कारण भारतीय उद्योग सस्ता माल बेचेंगे और फलस्वरूप विकसित देश जिनमे महंगा श्रम है प्रतिस्पर्धा का सामना नहीं कर पाएंगे और बंद हो जाएंगे। ऐसी आपदा से वह कैसे बच सकते हैं? इससे बचने का तरीक़ा है भारतियों को आपस में धर्म, जाति, भाषा, नस्ल आदि के आधार पर लड़वाना जो बहुत समय से हो रहा है।

हमारी राजनीति काफी हद तक धर्म और जाति के वोट बैंक पर चलती है और हमारे नेता विदेशी तत्वों के कठपुतली हैं, जो “बांटो और राज करो” नीति को चलाते हैं। इसका पूरा उद्देश्य है कि भारत एक विराट औद्योगिक राष्ट्र के रूप में उभर के न आये। हमें इस षड़यंत्र का पर्दाफाश करना है और एक ऐतिहासिक जनसंघर्ष करना है जिसके फ़लस्वरूपम एक ऐसी राजनैतिक व्यवस्था का निर्माण हो सके जिसके अंतर्गत तेज़ी से औद्योगीकरण हो और हमारी जनता को खुशहाल जिंदगी मिल सके। ऐसा ऐतिहासिक जनसंघर्ष आसान नहीं होगा। इसमें बड़ी बाधाएं आएंगी और कई उतार चढ़ाव तोड़-मरोड़ होंगे। यह लंबा चलेगा और इसमें बहुत क़ुर्बानियां देनी होंगी, पर और कोई विकल्प नहीं है।

markandey katju



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