15 June 2021

स्त्री का दुख – Jansatta

जब किसी समाज या देश में बड़ी उथल-पुथल होती है तो इसका सबसे ज्यादा प्रभाव महिलाओं पर देखने को मिलता है। यही कारण है कि कोरोना महामारी ने सीधे और गहरे तौर पर महिलाओं को व्यापक रूप से प्रभावित किया है। अगर हम बात करें भारतीय परिप्रेक्ष्य में तो पाते हैं कि सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और शैक्षणिक, स्वास्थ्य के मोर्चे पर महिलाओं की स्थिति में गिरावट दर्ज हुई है। इसके अलावा, समाज में लैंगिक असमानता भी बढ़ी है। अंदाजा इस बात से लगा सकते हैं कि वर्ष 2021 की ग्लोबल जेंडर गैप रिपोर्ट में भारत एक सौ चालीसवें स्थान में पायदान पर है, क्योंकि इस महामारी ने महिलाओं को आर्थिक स्तर पर बेहद कमजोर बनाया है।

विशेषज्ञों की राय मानें तो कहा जा रहा है कि कोरोना महामारी का सबसे ज्यादा नकारात्मक प्रभाव उन क्षेत्रों पर पड़ा है, जिन पर महिलाएं रोजगार के लिए सीधे तौर पर निर्भर थीं। जैसे स्कूल, घरेलू काम, पर्यटन, कैटरिंग, क्लीनिक आदि। इसके अलावा, सामाजिक और पारिवारिक स्तर पर महिलाओं की स्थिति इस कदर रही है कि उनके हाथ से रोजगार छिन जाने से परिवार, बच्चों और घर के बुजुर्गों की देखभाल का अतिरिक्त दबाव पड़ा है। वहीं महिलाओं के खिलाफ घरेलू हिंसा और महिलाओं के खिलाफ अपराधों में वृद्धि देखने को मिली है।

महिलाओं के हाथ से रोजगार चले जाने के कारण उनके मानसिक स्वास्थ्य पर बेहद ज्यादा नकारात्मक प्रभाव पड़ा है। दूसरी ओर, कुछ ऐसी महिलाएं थीं जो पहले से ही किसी और बीमारी का सामना कर रही थीं। ऐसे में उनके पास आर्थिक स्रोत नहीं होने के कारण उस बीमारी का भी उन पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा है। पिछले दो सालों में शिक्षा क्षेत्र में पैदा हुई समस्याओं का भी प्रत्यक्ष प्रभाव महिलाओं पर पड़ा है, फिर चाहे परीक्षाओं का बारंबार टलना हो या रोजगार से संबंधित समस्याएं। इस महामारी ने उन महिलाओं को विकास के मामले में सालों पीछे धकेल दिया जो विधवा, तलाकशुदा या किसी अन्य कारण से अकेले जीवनयापन करती हैं। इन समस्याओं से निपटने के लिए सरकारें कुछ उपाय कर सकती हैं। जैसे औपचारिक अर्थव्यवस्था को बढ़ावा दें।

इसके अलावा, सूचना तकनीक क्षेत्र के साथ-साथ अन्य क्षेत्रों में भी निवेश को प्रोत्साहन दिया जा सकता है। मसलन, कपड़ा उद्योग, गिग इकोनामी आदि। इसके अलावा, पहले से चली आ रही योजनाओं को बेहतर तरीके से लागू किया जाए और कम से कम तब तक सरकार को प्रधानमंत्री किसान योजना की तरह ही किसी व्यापक योजना को महिलाओं लिए शुरू करना चाहिए, जब तक की परिस्थिति सामान्य नहीं हो जाती।

इसलिए अब जरूरत है कि सरकारें है इस समस्या को गंभीरता से लें और अपनी नीति निर्माण में इसको प्राथमिकता दे। ऐसा करना केवल सरकारों की राजनीतिक जिम्मेदारी ही नहीं है, बल्कि संवैधानिक जिम्मेदारी भी है, क्योंकि भारत के संविधान के नीति निर्देशक तत्त्व भी सरकार को कल्याणकारी कदम उठाने के लिए प्रेरित करते हैं।

सौरव बुंदेला, भोपाल, मप्र



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